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राष्ट्रीय

‘स्वतंत्रता का मंत्र, वंदे मातरम’ : कर्तव्य पथ पर गुजरात की झांकी ने दिखाई भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की निर्माण यात्रा

26 जनवरी, 2026 09:42 PM

‘वंदे मातरम’ एक मंत्र है, जो हर भारतीय में स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वतंत्रता की अलख जगाता है। ‘वंदे मातरम’ गीत की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में, इस विषय के प्रतिघोष के रूप में ‘वंदे मातरम’ शब्द की पृष्ठभूमि से ही शुरू हुई भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बनने की यात्रा, उसका बदलता स्वरूप और इतिहास की रोचक प्रस्तुति 77वें गणतंत्र दिवस पर्व में गुजरात की झांकी का प्रमुख आकर्षण बना।

इसके साथ ही, इस झांकी ने गुजरात के नवसारी में जन्मी तथा गुर्जर भूमि के अपने प्रसिद्ध साथी क्रांतिवीरों-श्यामजी कृष्ण वर्मा और सरदार सिंह राणा के साथ विदेशी धरती से क्रांतिज्योत जगाने वालीं मैडम भीकाजी कामा द्वारा डिजाइन किए गए भारतीय ध्वज की यशोगाथा का वर्णन, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा है और ‘चरखे’ के माध्यम से स्वदेशी का मंत्र देने वाले महात्मा गांधी की स्मृति के साथ मौजूदा ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के सुंदर समन्वय के माध्यम से एक अनूठी छाप छोड़ी।

झांकी के अगले हिस्से में वीरांगना मैडम भीकाजी कामा को उनके द्वारा डिजाइन किए हुए ध्वज के साथ दर्शाया गया था, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था, जिसे उन्होंने पहली बार विदेशी धरती पर वर्ष 1907 में पेरिस में लहराया था। इस ध्वज को जर्मनी के स्टटगार्ट, बर्लिन की ‘इंडियन सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस’ में भी फहराया गया था। मैडम कामा की ध्वज लहराती अर्ध-प्रतिमा के नीचे संविधान में सूचीबद्ध सभी भारतीय भाषाओं में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था।

झांकी के दिल यानी मध्य हिस्से में राष्ट्रीय ध्वज की निर्माण यात्रा, उसके बदलते स्वरूप और इतिहास को दिखाया गया। इसकी शुरुआत होती है वर्ष 1906 से, जब कलकत्ता (अब कोलकाता) के पारसी बागान में क्रांतिकारियों ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाने और स्वदेशी का आह्वान करते हुए पहली बार ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ ध्वज फहराया था। इसके बाद, 1907 में विदेशी धरती से भारतीय क्रांति की ज्योति जगाने वाली मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में ध्वज फहराया था, जिसे उन्होंने खुद डिजाइन किया था। वर्ष 1917 में होमरूल आंदोलन के दौरान डॉ. एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने एक नया ध्वज फहराया।

वहीं, वर्ष 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में युवा क्रांतिवीर पिंगली वेंकैया ने एक नई डिजाइन का ध्वज बनाया और उसे गांधी जी को दिखाया। 1931 में पिंगली द्वारा तैयार किए गए ध्वज को लगभग स्वीकृति दे दी गई, जो तीन रंगों का बना था और उसके केंद्र में चरखा था। अंततः 22 जुलाई, 1947 को भारतीय संविधान सभा ने झंडे के केंद्र में चरखे की जगह धर्म चक्र के साथ तिरंगे को इसके वर्तमान स्वरूप में स्वीकार किया। वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज की इस निर्माण यात्रा के साथ भारत की आजादी के महत्वपूर्ण आंदोलनों का भी इस झांकी में निदर्शन किया गया।

झांकी के अंतिम हिस्से में ‘चरखे’ के माध्यम से स्वदेशी और स्वावलंबन की भावना को जागृत करने तथा स्वतंत्रता का आह्वान करने वाले महात्मा गांधी के शिल्प को एक विशाल धर्म चक्र के साथ दर्शाया गया था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी वर्तमान में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता के इन सशक्त मूल्यों को लगातार प्रोत्साहित करने का प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं।

देश की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सपूतों को याद कर राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले, ‘राष्ट्रीय शायर’ की उपाधि से सम्मानित गुजराती रचनाकार झवेरचंद मेघाणी द्वारा रचित गीत ‘कसुंबी नो रंग’ की लय और ताल पर उत्साह बढ़ाते कलाकार झांकी को जीवंत और जानदार बना रहे थे।

गुजरात सरकार के सूचना विभाग की ओर से प्रस्तुत इस झांकी के निर्माण में सूचना एवं प्रसारण सचिव डॉ. विक्रांत पांडे, सूचना आयुक्त किशोर बचाणी, अपर निदेशक अरविंद पटेल के मार्गदर्शन में संयुक्त सूचना निदेशक डॉ. संजय कचोट और उप सूचना निदेशक भावना वसावा ने योगदान दिया।

आपको बता दें, इस वर्ष गणतंत्र दिवस की परेड में 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अलावा केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की 13 झांकियों सहित कुल 30 झांकियां प्रदर्शित की गईं। कर्तव्य पथ पर हुई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में लगभग 2,500 कलाकारों ने हिस्सा लिया। देश भर से लगभग 10,000 विशेष अतिथियों को आमंत्रित किया गया था।

परेड की शुरुआत ‘राष्ट्रीय युद्ध स्मारक’ में एक गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ हुई, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सलामी मंच पर पहुंचीं और राष्ट्रगान हुआ तथा 21 तोपों की सलामी के साथ समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई।

इस बार गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपियन यूनियन के दो वरिष्ठ नेता यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा मौजूद रहे।

समारोह में इस वर्ष पहली बार ‘साइलेंट वॉरियर्स’ के रूप में पहचाने जाने वाले पशुओं ने भी परेड में हिस्सा लिया। इसके अंतर्गत मंगोलियन प्रजाति के बेक्ट्रियन ऊंट, सियाचिन ग्लेशियर में काम करने वाले खच्चर, शिकारी पक्षी और सैन्य श्वान दस्ते सलामी मंच के सामने से गुजरे।

सेना के विभिन्न अंगों के करतबों के साथ इस वर्ष पहली बार केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व 26 वर्षीय सहायक कमांडेंट सिमरन बाला ने किया। गुजरात में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली सिमरन ने गांधीनगर के सरकारी महिला कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त करके सीआरपीएफ की सहायक कमांडेंट की परीक्षा उत्तीर्ण की।

इसके साथ ही, यूरोपियन यूनियन की टुकड़ी ने भी इस परेड में हिस्सा लिया। इस वर्ष की परेड में पहली बार भारतीय सेना ने रणभूमि व्यूह रचना यानी ‘बैटल एरे’ फॉर्मेट की झलक दिखाई, जिसमें परंपरागत मार्चिंग दस्ते और सेवा प्रस्तुतियां शामिल थीं। 

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