प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इसके माध्यम से उन्होंने सत्य, विद्या, सौम्यता और सदाचार के महत्व को बताते हुए धर्म और परिवार की रक्षा का संदेश दिया। प्रधानमंत्री ने लिखा, “सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याभ्यासेन रक्ष्यते। मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते॥” इसका हिंदी अर्थ है कि धर्म की रक्षा सत्य से, विद्या की रक्षा नियमित अभ्यास से, रूप की रक्षा स्वच्छता और सौम्यता से तथा परिवार की प्रतिष्ठा की रक्षा सदाचार और अच्छे आचरण से होती है।
यह प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक महाभारत (उद्योग पर्व – 34/39) से लिया गया है। महाभारत के उद्योग पर्व के अंतर्गत अध्याय 39 (प्रजागर पर्व का हिस्सा) महाराजा धृतराष्ट्र और महात्मा विदुर के संवाद से जुड़ा है। इस अध्याय के प्रारंभ में राजा धृतराष्ट्र मनुष्य की परवशता, कर्म और दैवी (भाग्य) शक्ति पर विचार करते हुए विदुर से मार्गदर्शन और आत्मज्ञान की बातें पूछते हैं। महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को धर्म, सदाचार, सज्जन पुरुषों के लक्षण और राजा के कर्तव्यों का गहरा उपदेश देते हैं।
इस अध्याय में यह बताया गया है कि मनुष्य किस तरह मोह, लोभ और अहंकार में फंसकर विनाश के मार्ग पर चला जाता है और सच्चे ज्ञानी तथा नीतिवान व्यक्ति को कैसा आचरण करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को प्रधानमंत्री की ओर से संस्कृत श्लोक, “प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥” साझा किया गया था, जिसका हिंदी भावार्थ है कि आत्मज्ञान से मनुष्य को आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास मिलते हैं, जो उसे मानसिक तनाव से मुक्त करते हैं। अपने अनुभव से अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना ही सच्चा ज्ञान है और यही ज्ञान मनुष्य को परम शांति तथा अमरत्व की ओर ले जाता है।