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दुनिया

भारत-यूएस के बाद अब ब्राजील में छाई डिजिटल फौज, 'लूला आर्मी' ने कैसे किया ये कमाल!

01 नवंबर, 2026 01:11 PM

नई दिल्ली : हाल ही में 81 साल के लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने ब्राजील में इतिहास रच दिया। उन्होंने पहले दौर में हार के बाद दूसरे दौर में बंपर जीत हासिल की। ये कौतूहल का विषय रहा कि आखिर इसकी वजह क्या रही? दरअसल, इसके पीछे का प्रमुख कारण वो था जिससे लूला किनारा करते आए थे, लेकिन 'लूला आर्मी' ने उनका बिगड़ा काम बना दिया, और ये था सोशल मीडिया। अमेरिका में 2008 के चुनाव अभियान से शुरू हुई डिजिटल राजनीति की यह प्रभावशाली मिसाल भारत में 2014 के चुनाव अभियान में दिखाई दी और अब ब्राजील में लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की चुनावी वापसी ने इसे एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला की हालिया चुनावी जीत के पीछे सोशल मीडिया पर सक्रिय समर्थकों के एक बड़े नेटवर्क की भूमिका खास चर्चा में है। लूला की टीम ने पहले दौर में दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो से पिछड़ने के बाद अपनी डिजिटल रणनीति में बड़ा बदलाव किया। इस बदलाव का सबसे चर्चित हिस्सा बना 'लूला आर्मी' नाम का व्हाट्सऐप समूह, जिसके सदस्यों की संख्या पहले दौर के बाद करीब 60 हजार से बढ़कर लगभग 1.1 करोड़ तक पहुंच गई।

इस समूह की कमान सांसद आंद्रे जानोनेस के हाथ में थी। समूह से जुड़े लोगों को रोजाना छोटे-छोटे अभियान संबंधी काम दिए जाते थे। इनमें लूला के समर्थन में वीडियो साझा करना, सोशल मीडिया पर उनकी पहुंच बढ़ाना, दूसरे मतदाताओं से संवाद करना और अपनी तस्वीरों के जरिए अभियान को सामूहिक पहचान देना शामिल था।

युवाओं की नब्ज पर हाथ रखा गया और समर्थकों से ब्राजील की राष्ट्रीय फुटबॉल जर्सी पहनकर लूला के समर्थन में तस्वीरें साझा करने को भी कहा गया। इसका एक मकसद राष्ट्रीय पहचान से जुड़े उस प्रतीक को फिर से व्यापक रूप से अपनाना था, जिसे पिछले कुछ वर्षों में बोल्सोनारो समर्थकों के साथ जोड़कर देखा जाने लगा था।

इस अभियान की एक और खास बात यह रही कि लूला ने भी अपने पुराने संकोच को पीछे छोड़ते हुए सेल्फी मोड में वीडियो बनाना शुरू किया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव से महज चार दिन पहले उन्हें अपना पहला स्मार्टफोन मिला था। लंबे समय तक दूसरों के फोन के जरिए डिजिटल संवाद करने वाले लूला ने अंततः सेल्फी वीडियो के माध्यम से मतदाताओं तक सीधे पहुंचने का रास्ता अपनाया।

ब्राजील में जो प्रयोग अब देखने को मिला है, उसकी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मिसाल करीब 18 साल पहले अमेरिका में सामने आई थी।

वर्ष 2008 में बराक ओबामा ने अपने राष्ट्रपति चुनाव अभियान में इंटरनेट और सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि समर्थकों को अभियान की ताकत में बदल दिया था। उस समय फेसबुक, यूट्यूब, ईमेल और टेक्स्ट मैसेजिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था। ओबामा की टीम ने इस बदलाव को समझते हुए 'माय बराकओबामाडॉटकॉम' नाम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया, जहां समर्थक आपस में जुड़ सकते थे, स्थानीय स्तर पर प्रचार की योजना बना सकते थे और दूसरे लोगों को अभियान से जोड़ सकते थे।

स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस के एक अध्ययन के मुताबिक, ओबामा की टीम ने सोशल मीडिया और तकनीक का इस्तेमाल न केवल चुनावी चंदा जुटाने के लिए किया, बल्कि ऐसे वालंटियर तैयार करने के लिए भी किया जिन्हें लगता था कि वे खुद चुनावी प्रक्रिया में बदलाव ला सकते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 के चुनाव में 55 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने चुनाव से जुड़ी जानकारी हासिल करने या राजनीतिक संवाद के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल किया था। ओबामा के समर्थक ऑनलाइन राजनीतिक गतिविधियों में अपने प्रतिद्वंद्वी जॉन मैक्केन के समर्थकों से अधिक सक्रिय थे।

अमेरिका से रुख करते हैं भारत का। भारत में भी इसी तरह का बदलाव 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाई दिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने सोशल मीडिया को अपने चुनाव प्रचार की केंद्रीय रणनीति का हिस्सा बनाया। ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने के साथ-साथ पार्टी ने डिजिटल वालंटियर, ऑनलाइन प्रचार समूह और तकनीकी संसाधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया।

उस समय प्रचार अभियान में सोशल मीडिया की भूमिका केवल संदेश साझा करने तक सीमित नहीं थी। युवाओं और पहली बार मतदान करने जा रहे लोगों तक पहुंचने के लिए इंटरनेट आधारित संवाद को खास महत्व दिया गया। सोशल मीडिया पर पीएम मोदी के भाषणों, वीडियो और चुनावी संदेशों को व्यापक स्तर पर साझा किया गया। पार्टी ने डिजिटल प्रचार के लिए अलग-अलग स्तर पर टीमों और वालंटियरों को जोड़ा।

2014 के भारतीय चुनावों पर प्रकाशित एक शोध अध्ययन में 11 राजनीतिक दलों के 98,363 ट्वीट का विश्लेषण किया गया था। इसमें पाया गया कि भाजपा ने ट्विटर पर युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया और मतदाताओं के साथ संवाद की कोशिश की। अध्ययन में इंटरनेट की पहुंच और पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या का चुनावी नतीजों के साथ संबंध भी सामने आया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इसके साथ यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया के प्रभाव को चुनावी जीत का अकेला कारण नहीं माना जा सकता।

इस तरह ओबामा और मोदी के चुनावी अभियानों ने डिजिटल माध्यमों को राजनीतिक संवाद और समर्थकों की लामबंदी का महत्वपूर्ण औजार बनाया। लेकिन लूला के मामले में एक दिलचस्प बदलाव यह है कि यहां समर्थकों के एक बड़े नेटवर्क को रोजाना छोटे-छोटे काम सौंपकर एक संगठित डिजिटल अभियान का रूप दिया गया। इसमें केवल पार्टी के आधिकारिक अकाउंट से संदेश जारी करने के बजाय आम समर्थकों को भी कंटेंट तैयार करने और उसे फैलाने की जिम्मेदारी मिली।

तीनों उदाहरणों में एक समान बात यह दिखाई देती है कि डिजिटल माध्यमों ने उम्मीदवार और मतदाता के बीच की दूरी कम करने का अवसर दिया। ओबामा के समय इंटरनेट आधारित वालंटियर नेटवर्क और ऑनलाइन फंडिंग पर जोर था, पीएम मोदी के अभियान में सोशल मीडिया के जरिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक संवाद और डिजिटल पहुंच का विस्तार हुआ, जबकि लूला के अभियान में व्हाट्सऐप समूह और कंटेंट क्रिएटर समर्थकों की संगठित भागीदारी का माध्यम बने।

हालांकि लूला की जीत को भी केवल डिजिटल अभियान का परिणाम नहीं माना जा सकता। ब्राजील में युवाओं के विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक कल्याण योजनाओं और मतदाताओं की लामबंदी ने भी भूमिका निभाई।

फिर भी इन उदाहरणों से चुनावी राजनीति में आ रहे एक बड़े बदलाव को समझा जा सकता है। अब राजनीतिक दलों के सामने केवल यह चुनौती नहीं है कि वे कितने लोगों तक अपना संदेश पहुंचा सकते हैं, बल्कि यह भी है कि कितने लोग उस संदेश को आगे बढ़ाने के लिए खुद सक्रिय होते हैं। सोशल मीडिया पर किसी नेता के लाखों फॉलोअर्स होना और उन फॉलोअर्स का चुनावी अभियान में सक्रिय भागीदार बनना दो अलग-अलग बातें हैं।

 

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